Thursday, December 17, 2009

मैं इक दीवाना पंछी

मैं इक दीवाना पंछी उड़ता हूँ डाली डाली
मैं शाख शाख डोलूँ फिरता हूँ डाली डाली

जिस तरफ उड़ चले हम उस तरफ़ दुनिया झुकती
जहाँ पर भी रुक गए हम पागल हवाएं रूकती

मैं शहंशाह हूँ दिल का हूँ दो जहाँ का माली

अपनी वही है मंजिल गिरता जहाँ कदम है
ना कोई मुझ को शिकवा ना कोई मुझ को गम है

है मौज अपनी मस्ती मौजों के हम हैं वाली

हमें चिंता नहीं है कल की हम आज के दीवाने
तू आज की फ़िक्र कर कल क्या हो कौन जाने

हर हाल है मुकद्दर अफ़सोस या खुशहाली

मेरी खुशी पे तुम को क्यों रश्क आ रहा है
ऐ बहारो रंग बरसो दीवाना जा रहा है

खुशियों के हम दीवाने हो ईद या दिवाली

मैं इक दीवाना पंछी उड़ता हूँ डाली डाली
मैं शाख शाख डोलूँ फिरता हूँ डाली डाली

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