Thursday, December 17, 2009

ता जिन्दगी

ता जिन्दगी हम तेरा इंतज़ार करते रहे
तेरे आने को मैं अपना मुक्कद्दर समझ बैठा था
तेरा पैरहन, तेरी मुस्कान, तेरे आगोश को
अपनी तन्हा रातों की सहर समझ बैठा था

जब तक इस बहते हुए पानी में रवानी है
इस नदी के दो किनारे मिल नहीं सकते
मिलें गे तब ,जब सूख जाए गी ये रेगज़ारों मैं
उस मिलने को तो मिलना कह नहीं सकते

यूँ तो अब भी हर रात तेरा ख़याल आता है
मुझे पता है मेरी जिंदगी से दूर जा चुकी हो तुम
फिर भी जाने क्यों हर आहट पे वहम सा होता है
मेरे दरवाजे के बाहर किसी असमंजस में रुकी हो तुम

लगता है अभी दरवाजे पे थपथपाहट होगी
तेरी पेशोपेश ,तेरा असमंजस टूट जाए गा
अभी कहीं से आ के कहो गी तुम मुझ से
अपनी मंजिल अपना मुकद्दर एक हो जाए गा

मैं तेरी आवाज़ को ढूँढता हूँ इन वीरानों में
यहां हवा की सरसराहट के सिवा कुछ भी नहीं
में जिसे तेरा साया तेरी आवाज़ समझ बैठा था
दर हकीकत मेरे इंतज़ार के सिवा कुछ भी नहीं

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