Thursday, December 17, 2009

ये साल भी गुज़र गया

ये साल भी गुज़र गया हर साल की तरह
फुटपाथ पे सोने वाले फुटपाथ पे सोते रहे
हर बार की तरह इस बार भी वह आया था
झोपड़ी के वादे के साथ
इक वोट ले गया और कह गया
बेफिक्री से सोते रहो
इस फुटपाथ को अपनी समझो
हिंदुस्तान आज़ाद है
ये साल भी गुज़र गया हर साल कीतरह

लोग घरों से निकलने से डरते रहे
जो गया है वो पता नहीं शाम को
वापिस भी आएगा या नहीं
क्या पता किस बस को रोक कर
वो दो फिरकों में बाँट दें
और एक फिरके के सीने को
गोलियों से छलनी कर दें
बेगुनाह मरते रहे गोलियां चलती रहीं
ये साल भी गुज़र भी गया हर साल कीतरह

हिंदुस्तान की आजादी बरकरार है
क्योंकि कुछ लोगों की कुर्सियाँ सलामत हैं
किस को फुर्सत है कि देखे
कि किस का घर जल गया
कौन जो गया था वापिस नहीं आया

जिन को चुन के भेजा था
हम ने बड़ी उम्मीद से
वो हमें साँस लेनेतक का हक दे सके
ये साल भी गुज़र गया हर साल कीतरह

अब किसी की मौत से
किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता
लोग आदी हो गए हो गये हैं
अखबार में एक गिनती देखने के
कितने गए
जो भी इस कुर्सी पे आया
वादों के खुशनुमा जाल बुनता रहा
लोग जहां थे वहीं के वहीं रहे
गिरते हुए खंडहर की दीवार की तरह
ये साल भी गुजर गया हर साल कीतरह

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