Thursday, December 17, 2009

मुझ पे इक बोझ है Mujh pe ik bojh hai

मुझ पे इक बोझ है
तारीख गवाह है
मैंने अपने दौर के अश्कों को पिया है
मैंने अपने दौर के जख्मों को सिया है

ख़ुद पिए रंज गम औ अश्क सही
शिकन माथे पे एक आ ना सकी
जब्त करता रहा मैं अपनी शिकस्तों को
हो सका जितना मैंने दी है
मुस्कानें दुनिया को

मैं चला ऐ मेरे हमदर्द वतन और ज़हां
याद जो आए मेरी इक अश्क बहा लेना
पर ना कोई देख सके
दुनिया को मुस्कान ही देना
नहीं किसी के पास है फुर्सत इतनी
कि तेरे आंसू की कीमत जान पाये गा
लोग चलते रहें गे अपनी राहों पर
हर मोड़ पर तू अकेला हो जाए गा

मुझ पे इक बोझ है
तारीख गवाह है

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