Thursday, December 17, 2009

जो छिड़ी थी कहानी

जो छिड़ी थी कहानी ख़त्म हो गई
बात बनने से पहले ख़त्म हो गई

रात ढलती रही वक्त चलता रहा
टीस उठती रही दर्द बढ़ता रहा
मेरे सपनों की दुनिया अँधेरी रही
चिराग दिल का सारी रात जलता रहा

अरमानों की मैंने जलाई शंमा
जो जली ना जली कि ख़त्म हो गई

रात जख्मों से परदा उठाती रही
तेरी याद मुझ को सताती रही
भुलाने की कोशिश बहुत की मगर
लम्हे लम्हे की याद आती रही

तामीरे मुहब्बत बनाई बहुत
मगर बनने से पहले ख़त्म हो गई

चमकते सितारों ने देखा मुझे
रात सूने नजारों ने देखा मुझे
गमे दिल के जख्मों को सीता रहा
मुड़ के जाती बहारों ने देखा मुझे

रात यूँ ही करवटें बदलता रहा
नींद आ न सकी कि सहर हो गई




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