Thursday, December 17, 2009

सोचा ना था

सोचा ना था कि फूल भी गुलशन से खफा होंगें
मिलने से पहले ही हम तुम से जुदा होंगें

उजड़ा चमन बहार का उजडे कली व् फूल सब
कदम कदम पे ठोकरें बिस्तर बने हैं शूल अब

ना तुम रहे ना मैं रहा बाकी रही है दास्ताँ
वो भी वक्त के दौर में भूल जाए गा ज़हां

ये क्या हुआ कि पलक में सारा चमन उजड़ गया
ये क्या हुआ किस मोड़ पर मेरा हमसफ़र बिछुड़ गया

कैसी चली थी ये हवा सब कुछ बहा के ले गई
दरो दीवार किधर गए खिजां का साथ दे गई

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