Thursday, December 17, 2009

कोई अपना नहीं होता

कोई अपना नहीं होता
लोग महज अपनेपन का दिखावा करते हैं
अपनी ज़रूरतों के लिए
अपने स्वार्थ के लिए

अपनापन महज एक छलावा होता है
इस छलावे को हम फिर भी अपना लेते हैं
बगैर इस के ज़िन्दगी बहुत कोरी हो जाती है

कोई अपना नहीं होता
अपने महज गम होते हैं
जो बांटने से कम नहीं होते
बढ़ जाते हैं

अपने और पराये के बीच की रेखा
बहुत पतली होती है
और अक्सर बनती मिटती ही रहती है
अपनों से घिरा आदमी भी अपने आप को
और अकेला पाता है

अपनापन इस जीवन के नाटक का सूत्रधार है
जैसे सूत्रधार के बगैर नाटक नहीं चलता
अपनेपन के दिखावे के बगैर
जीवन भी नहीं चलता

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